अनुभव

फेंकने की होड़ मची है, रोज़मर्रा की दिनचर्या में ऐसे लोग मिल ही जाते है जिनके रिश्तेदार-नातेदार, दोस्त-मित्र, भैया-चाचा, कोई न कोई उनका जानने वाला ऐसा होता ही है जो इस धरती पर सबसे बड़ा तीसमार खान होता है। कुछ लोग तो खुद में तीसमार खान होते है। जिनसे आप कुछ देर बात करिए तो वो मिसाल देना शुरू कर देंगे। 


जैसे उनके बोल होते है 'मेरे बिना यहां एक तिनका भी नहीं हिल सकता, ऑफिस में तो बास भी खड़े हो जाते है मेरे जाने पर, कालेज टाइम तो फैकल्टी सलाम करती थी भाई। ये सारी बाते एक बार की नहीं होती। ऐसे फेंकू लोगों की आदत में शुमार हो गया है। दरअसल हम ऐसे लोगों से घिरे है जिनसे आप कई बार मिलिये कहानी वही पुरानी होगी। शायद यह एक रोग बन गया है और समय के साथ ऐसे प्रजाति के लोग बढ़ते ही जा रहे है। पता नहीं ऐसे लोगों की क्या चाह होती है, वैसे नोबल पुरस्कार मिलना चाहिए ऐसे लोगों को।

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