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फीफा विश्वकप 2018: नेमार की नुमाइश रही फीकी, 40 साल बाद ब्राजील ने बनाया ऐसा शर्मनाक रिकॉर्ड

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फीफा विश्वकप 2018 में अभी तक फेवरेट टीमों की स्थिति कुछ सुखद नहीं कही जा सकती. जिस मैच से पहले फुटबॉल प्रेमी उम्मीद लगा रहे हैं कि शायद यह मैच एकतरफा होगा वह बिल्कुल उसके विपरीत होता दिख रहा है. कल खेले गए दो मुकाबलों के नतीजें तो एक दम से हैरान करने वाले थे. पहले डिफेंडिंग चैंपियन जर्मनी को मैक्सिको के हाथों शिकस्त झेलनी पड़ी. फिर खिताब के प्रबल दावेदारों में शुमार पांच बार की चैंपियन ब्राजील ने को भी स्विट्जरलैंड के खिलाफ ड्रा से ही संतोष करना पड़ा. इससे पहले स्टार खिलाड़ियों से सजी अर्जेंटीना का अनुभवहीन आइसलैंड के सामने जो हाल हुआ वो किसी से छुपा नहीं है. बता दें, रविवार को ​वर्ल्ड कप 2018 के ग्रुप-ई के अपने पहले मुकाबले में स्विट्जरलैंड से 1-1 का ड्रॉ खेला. वर्ल्ड कप में 1978 के बाद यह पहली बार हुआ है जब ब्राजील की टीम अपना ओपनिंग मुकाबला जीतने में नाकाम रही. यही नहीं ऐसा पहली बार हुआ जब जर्मनी, ब्राजील और अर्जेंटीना विश्व कप में अपना शुरुआती मैच नहीं जीत पाईं. अर्जेंटीना ने अपना पहला मैच आइसलैंड के साथ 1-1 से ड्रॉ खेला. जर्मनी की टीम मैक्सिको से 0-1 से हार गई. पहला गोलः 20वें मिनट ...

प्रधानमंत्री जी ! बहुत उम्मीदें थी आपसे लेकिन अभी तक निराश हूँ

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"मैं यहां आया नहीं हूं मुझे बुलाया गया है, गंगा मैया ने बुलाया। देश की कमान 60 महीनों के लिए इस प्रधानसेवक को सौंप दीजिए। पाई पाई का हिसाब दूंगा। मुझे देश का चौकीदारी बना दीजिए। न खाउंगा न खाने दूंगा।" आपके ऐसे ना जाने कितने बयान थे, जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान छपे अखबारों में हेडलाइन बनकर सुर्खियां बटोरीं। चुनावी रैलियों के मंचों के साथ आपके भाषण बदलते रहे, बिहार गए तो बिहार की जनता का दर्द आपकी जुबान पर था और यूपी आए तो यूपी की जनता का दर्द। अपनी क्षमताओं की नुमा​इश से आपने एक ऐसा माहौल बना दिया मानो हर मर्ज की एक ही दवा है मोदी। सरकारी विभागों के भ्रष्टाचार से लेकर राजनीति में वंशवाद और परिवारवाद तक, किसानों की आत्महत्या से सीमा पर आतंकवादियों के खिलाफ लड़ाई में जान गंवाते सेना के जवानों तक, गरीबों को उनका हक दिलाने से लेकर विदेशों में छुपाए कालेधन को वापस लाने तक और शिक्षा के गिरते स्तर से लेकर रोजगारों के अवसरों को बढ़ाने तक हर परेशानी को दूर करने की जिम्मेदारी आपने ली थी। वो भी 60 महीनों में। आज आप प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल का तीन च...

बलिया बनाम लखनऊ, बागी बनाम तहजीब

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पड़ोसी (अंसारी जी) ने लिख मेरी बाइक पर चस्पा किया है। (मैंने उनके गेट के सामने अपनी बाइक लगा दी थी) हर शहर और इलाके की आब ओ हवा का अपना एक अलग रंग और मिजाज होता है जिसका असर वहां के लोगों पर देखा जा सकता है। इस बात को आज मैने बड़े करीब से महसूस किया। ' वीरों की धरती जवानों का देश बागी बलिया उत्तर प्रदेश' इस कहावत को सुनकर जवान होते-होते कब मैं अपने भीतर एक बागी को देखने लगा यह बात मुझे भी नहीं मालूम, जिन्दगी आगे बढ़ी और मैं भी आगे बढ़ने और कुछ बड़ा करने के इरादे के साथ बलिया से निकल लिया। साथ में मां बाप के अशीर्वाद और जरूरत के सामान के साथ जो चीज सबसे भारी समझ पड़ रही थी वो अपना बागी एटीट्यूट था।  अपना नया ठिकाना लखनऊ में जमा था, जो चार साल बाद आज भी कायम है। वही चार दोस्त और एक दो कमरों का किराए का मकान जिसे हम जैसे बागी फ्लैट का नाम दे चुके हैं। पढ़ाई, नौकरी और बागी की प्राइवेट लाइफ इन तीन बातों के बीच मजे की बीत रही है। लखनऊ आकर बहुत कुछ बदला है, बहुत कुछ सीखा है तो बहुत कुछ पीछे छूट गया।  बहुत दिन बाद आज फिर कुछ नया सीखने को मिला, जो लखनऊ के सिवा कोई और शहर नहीं...

एक काल्पनिक जिसे पढ़ शायद हर कोई भावुक हो जाये

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          डियर मम्मी पापा,  आज 9 साल के बाद मेरे बारे में एक बार फिर अदालत का फैसला आया है. मैं कहीं दूर आसमान से इसे देख पा रही हूँ और अब जब आप दोनों आज डसना जेल से निकालेंगे तो यकीन मानिये मैं बहुत खुश हो रही होंगी आखिर किस बच्चे को अपने मम्मी पापा को जेल में देख कर अच्छा लगता है . पापा, आपकी लाडली अगर आज आपके पास होती तो आप उसका 22 वाँ जन्मदिन मनाने की तैय्यारियों में जुटे होते. और मैं शायद अपने मम्मी पापा की तरह ही एक डाक्टर बन चुकी होती या शायद कुछ और मगर जो भी होती आपको गर्व होता. लेकिन मेरी किस्मत में शायद ये लिखा ही नहीं था. मैं आप दोनों के साथ एक खुशहाल जिंदगी बिताना चाहती थी हर दूसरे बच्चे की तरह, लेकिन 16 मई 2008 की रात हम सब पर भारी रही. मम्मी तुम तो जानती हो मेरे बारे में. हर माँ अपने बच्चे के बारे में सब कुछ जानती है. मेरे सपने को मेरे दोस्तों को और मेरा सब कुछ. मगर यहाँ से मैं ये भी देख रही हूँ कि देश भर में लोग उस 16 मई की रात क्या कुछ हुआ उसे जानना चाहते हैं. आखिर क्यूँ आप दोनों को इतने लम्बे समय तक जेल में रहना पड़ा , ये भी ...

चंद रवीश और कुछ अंजना को छोड़ दें तो मीडियाकर्मियों के खून से सनी है 'पत्रकारिता'

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आज एक दोस्त से मुलाकात हुई। मीडिया को लेकर वो मुझसे मेरा अनुभव जानना चाहते थे। मैंने कहा यह अनुभव दुखी नहीं करता वरन इसके बारे में सोच कर घिन आने लगती है। वे ये सुन ऐसे देखने लगे, जैसे वो कोई और ही जवाब तलाश रहे थे। कुछ स्टार वाला, फेम वाला, नेम वाला। उन्हें भी उसी आंख से दिमाग में उतरने वाली चकाचौंध सा जवाब चाहिए था। मेरा जवाब सुन वो बोल पड़े, कैसे? मुझे बस इस एक शब्द का इंतजार था, कैसे। और मैंने कहा कि एक मीडिया का बंदा अपनी पूरी जिंदगी इस फील्ड को देता है, लेकिन बदले में उसे क्या मिलता है। कुछ टूटे सपने, शोषण, निराशा, अवसाद और चिल्लर वाली सैलरी, जिससे ढंग से उसका खर्च तक न चल सके। एक गाय की मौत पर घंटों चीखने वाले टीवी चैनल और पेपर घिसने वाले अखबार के मालिकान और संपादक को यह परवाह नहीं कि उसका कर्मचारी तिल-तिल मर रहा है। उसके सपने एक-एक कर टूट रहे हैं, बिखर रहे हैं। जिन्हें सहेजने का कोई उपाय नहीं। चेन की छिनौती करने पर डेढ़ कॉलम न्यूज छापने वाले अखबार की ये औकात नहीं कि अपने कर्मचारी की मां के लिए तीन लाइन की शोक संवेदना छाप सके। चंद रवीश और कुछ अंजना को छोड़ दें तो बाकी मीडिया ...

नमक तो स्वादानुसार ठीक था, अब मुद्दे भी...

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अखबार की बेस्वाद कवर स्टोरी, समाचार चैनलों पर हर शाम होने वाली बेमतलब की बहस और सोशल मीडिया पर बुद्धिजीवी वर्ग की पोस्ट का स्वाद कब बदल जाए ये किसी को नहीं पता। इन सब को बदलने के लिए तड़का चाहिए होता है, ठीक वैसा जो घर की दाल में अनिवार्य रूप से लगाया तो जाता है, लेकिन ज्यादा मजा होटल की दाल वाला देता है। यहां हम घर की दाल त्रिपुरा के शांतनु भौमिक हत्याकांड और पंजाब में केजे सिंह हत्याकांड को मान सकते हैं और होटल की दाल के तौर पर बेंग्लुरू के गौरी लंकेश हत्याकांड को ले सकते हैं। इन तीनों हत्याकांड की तुलना आपस में किया जाना बेहद गलत है, लेकिन इसके बावजूद करना पड़ता है क्योंकि बहुत बड़ा और अक्सर चुनिन्दा मुद्दों पर मुखर होने वाला वर्ग इन घटनाओं को चुपचाप तौलने में जुटा है। तो चलिए अब तुलना शुरू करते हैं। पहला मामला गौरी लंकेश की हत्या का था। दो तीन अपराधी आते हैं और गोली मारकर उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। यह एक दर्दनाक लेकिन एक सामान्य सी नजर आने वाली आपराधिक घटना थी। इसके बाद दूसरा मामला है शांतनु भौमिक के अपहरण और हत्या का है। शांतनु का अपहरण उस समय हुआ जब वह रिर्पोटिंग ...

काश! किसी ने पहल की होती।, आज बीएचयू का तमाशा नहीं बनता

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देखते ही देखते एक अच्छा-खासा और जरूरी सा आंदोलन कब हिंसाई और बौद्धिक तमाशा में बदल जाता है समझ में नहीं आता. लड़कियों की मांग कहाँ गलत थी. ? क्या अपनी सुरक्षा की मांग करना नाजायज है ? या उपर से ये कहना कि दो मिनट वीसी साहेब आकर मिल लेंगे तो हम लोग अपना प्रदर्शन बन्द कर देंगे। कितना अच्छा होता कि पहले ही दिन वीसी साहेब आते और लड़कियों के सर पर हाथ रखकर कह देते की "बेटी आप लोग निर्भीक रहें बीएचयू प्रशासन सदैव आपके साथ है" इतनी जिम्मेदारी तो बनती है न ? वाइस चांसलर एक यूनिवर्सिटी का गार्जियन ही तो है और बीएचयू प्रशासन संरक्षक। अब लड़कियां और लड़के अपनी बात इनसे नहीं कहेंगे तो किससे कहेंगे ? क्या इनको इतना पता नहीं था कि लड़कियों को सुरक्षा के प्रति आश्वस्त नहीं किया गया,तो कुछ लोग इस जरूरी आंदोलन के बहाने माहौल बिगाड़ने की भयंकर साजिश रच सकतें हैं..कुछ कलम लेकर बैठ सकते हैं और कुछ बम लेकर. और दुर्योग से वही हुआ भी..रात दस बमों की आवाज से समूचा परिसर ही नहीं दो किलोमीटर तक का इलाका गूंज उठा,अब बताइये ये बम बनाने वाले कौन लोग होंगे ? और उनकी मंशा क्या रही होगी.?। ये भी बताना...