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अमृता का इश्क जिसे साहिर ने खूबसूरत मोड़ पर छोड़ दिया, फिर आए इमरोज

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प्रेम में डूब कर जीना और उस भाव को स्‍याही से कागज पर उकेर देना ये अमृता प्रीतम से बेहतर कौन कर पाया. मेरे लिए अमृता अपनी आत्‍मकथा 'रसीदी टिकट' में सिमटी एक सुकून की दुनिया है. जब-जब मुझे प्रेम की राह में ठोकरें मिली तो रसीदी टिकट ने मुझे संभाला है. आलम ये है कि प्रेम में डूबे होने पर या हिज्र में जीते हुए भी अमृता का साथ होना बेहद जरूरी है. अमृता को आज इस लिए भी याद कर रहा हूं कि 31 अगस्‍त को उनकी यौम-ए-पैदाइश है. अमृता का जन्‍म 31 अगस्‍त 1919 को पंजाब (भारत) के गुजरांवाला जिले में हुआ था. अमृता पर लिखना ऐसा है जैसे उन्मुक्त हवा को बांधने की सिफर सी कोशिश करना. क्‍योंकि अमृता को न कोई बांध पाया था, न कोई बांध पाएगा. अपने आजाद ख्‍यालों से साहित्यिक दुनिया के माथे पर बल लाने की कूवत रखने वाली अमृता की दुनिया ही अलग सी थी. अमृता का जीवन साहिर लुधियानवी के जिक्र के बिना अधूरा सा लगता है. न जाने कितनी रचनाएं अमृता ने साहिर के प्रेम में लिखीं. हालांकि ये प्रेम अपने वजूद को न पा सका, लेकिन कई कहानियां अधूरी होकर भी पूरी सी लगती हैं. अमृता और साहिर की कहानी भी ऐसी ही है, जो पूरी न...

हमने तो क्रिकेट के भगवान को भी नहीं छोड़ा , माही तुम क्या चीज़ हो

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महीने भर पहले आईपीएल में आग उगलने वाले धोनी के बल्ले को अचानक क्या हो गया. मैदान पर दहाड़े मारने वाला शेर इतना खामोश कैसे हो गया. कहीं यह आने वाले तूफ़ान से पहले की खामोशी तो नहीं. अभी तक जो योद्धा निडरता से अपनी सेना का नेतृत्व कर रहा था अचानक उसकी तलवार की धार बेअसर कैसे हो गयी. क्या वाकई यह वक़्त आ गया है जब माही को सम्मान में साथ मैदान छोड़ देना चाहिए. उन्हें अपने तलवार को म्यान में रख देना चाहिए. मैं इस बात से अभी सहमत नहीं हूँ, मैं उन मौकापरस्त क्रिकेटप्रेमियों में से नहीं हूँ जिन्होंने बुरे वक्त में क्रिकेट के भगवान तक को नहीं बख्सा. वह बल्लेबाज जो वर्षों से भारत के लिए मैच फिनिश करता आ रहा हैं उसे इस बात की खबर ही नहीं कि उसका करियर फिनिश होने की कगार पर है. हमारे यहाँ एक्सपर्ट तो पहले ही तय कर चुके हैं कि किस खिलाड़ी को कब रिटायर होना. इन्हीं सब को देखते हुए मन के अंदर एक डर सा बैठ गया है कि माही भी इस शोर-शराबों बीच जल्द ही ब्लू जर्सी न त्याग दे. वह खिलाड़ी जिसने इस देश के क्रिकेट प्रेमियों के ख्वाब को हकीकत में बदला. वह लड़का जिसने रांची जैसे छोटे शहर की पहचान बताई. वह इंसान जो आ...

दादा के पास दिल नहीं जिगरा था, सिखाया- कैसे जीता जाता है मैच

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1992 विश्व कप खेलने भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया रवाना हुई। वर्ल्ड कप से पहले ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट इंडीज के साथ एक त्रिकोणीय श्रंखला भी आयोजित की गई। भारतीय टीम में चयन हुआ बंगाल के 19 वर्षीय युवा खिलाड़ी सौरव चंडीदास गांगुली का। सौरव गांगुली को उस सीरीज में एक्का दुक्का मौके मिले पर वह खास प्रदर्शन न कर पाए। वर्ल्ड कप के लिए घोषित टीम में उनका चयन नहीं हुआ। वर्ल्ड कप के लिए टीम में न चुना जाना उतनी बड़ी बात नहीं थी, बड़ा मुद्दा ये था कि टूर के मैनेजर ने सौरव गांगुली के एटीट्यूड पर सवालिया निशान लगा दिए थे। मामला ये था कि एक मैच में सौरव गांगुली से मैदान में खेल रहे खिलाड़ियों के लिए ड्रिंक्स ले जाने को कहा गया, तो उन्होंने के जाने से इनकार कर दिया। इस सीरीज के बाद सौरव गांगुली 4 साल तक भारतीय टीम में नहीं आ पाए। 1996 विश्व कप में मोहम्मद अजरुद्दीन की कप्तानी में सेमीफाइनल में आश्चर्यचकित करने वाली हार और उसके बाद सिंगापुर और सिंगापुर और शारजाह में पाकिस्तान के खिलाफ मिली पराजय से टीम का मनोबल निचले पायदान पर था। फिर हुआ भारत का इंग्लैंड दौरा, 5 वर्षो बाद प्रिंस ऑफ कोलकाता की भारतीय टी...

दादा बर्थडे: जब इंग्लैंड में एक शख्स ने तान दी थी बंदूक, लड़की ने बचाई थी जान

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कैप्टन कूल कहे जाने वाले टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी से पहले भारतीय टीम के पास एक एग्रेसिव कप्तान भी था. जिसने टीम इंडिया को विपक्ष पर आक्रामक करना सिखाया. उसने सिखाया की क्रिकेट के मैदान पर दहाड़े कैसे मारते हैं. आज उस खिलाड़ी जा जन्मदिन है. जी हाँ, हम बात कर रहे है प्रिंस ऑफ कोलकाता कहे जाने वाले सौरव गांगुली की. जो आज यानी रविवार को अपना 46वां बर्थडे मना रहे हैं. दादा ने जब भारतीय टीम की कमान संभाली थी तो उन दिनों टीम इंडिया बैक फूट पर खेलना पसंद करती थी. बैक फूट यानी मैच जीतने के लिए नहीं बल्कि मैच बचाने के लिए. फिर दादा ने सिखाया मैच कैसे जीता जाता है जो आज भारतीय टीम की आदत बन चुकी है. 8 जुलाई 1972 को कोलकाता में जन्में सौरव ने 20 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय डेब्यू कर लिया था. गांगुली की बल्लेबाजी की खासियत थी कि वह ऑफ साइड पर आसानी से शॉट लगा देते थे. उनकी इस हुनर से प्रभावित होकर एक बार उनके साथी खिलाड़ी राहुल द्रविड़ ने कहा था, 'अगर ऑफ साइड का कोई भगवान होता, तो उन्हें गांगुली कहा जाता.' स्पिनरों पर जिस तरह से दादा लम्बे लम्बे छक्कें लगाते थे इस...

आख़िर क्यों भारत के इस खिलाड़ी को हथियाना चाहता था पाकिस्तान?

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धोनी के जन्म से कुछ साल पहले लगभग आधी सदी पहले एक शख्स का जन्म हुआ था। धोनी बेशक अपनी दुनिया, अपने जमाने के महान और बेहतरीन खिलाड़ी हैं। लेकिन यहाँ बात की जा रही है एक ऐसे शख्स की, जो बचपन में धोनी की तरह ही फुटबाल खेला करता था। अपनी स्कूल की टीम में फुटबाल की गोलकीपिंग करता था। वो स्कूल फुटबालर आगे चल कर फुटबाल को छोड़ हॉकी का दामन थाम लेता है । बस खेल बदलता है, पोजिशन नहीं और न ही उसके तेवर! इस तरह एक फुटबालर हॉकी का दिग्गज खिलाड़ी बन जाता है और शामिल हो जाता है महान खिलाड़ियों की उस जमात में, जिसमें मेजर ध्यानचंद जैसे लोग शामिल हैं। आज जब धोनी के प्रशंसक उनका जन्मदिन मना रहे हैं, ऐसे में शंकर लक्ष्मण को कोई याद भी नहीं कर रहा है। जहाँ धोनी ने भारत को दो विश्वकप टी-20 2007 और 2011 विश्वकप में विजेता बनाया है, तो शंकर ने भी भारत को ओलम्पिक में दो स्वर्ण पदक और एक रजत पदक दिलाया है। शंकर ने 1956 ओलम्पिक में स्वर्ण, 1960 में रजत और फिर 1964 में स्वर्ण पदक जीतने में योगदान दिया। शंकर के खेल-स्तर का अंदाजा इससे भी लगता है कि शंकर ने लगातार तीन ओलम्पिक फाइनल में गोलकीपिंग की और बस एक ग...

टूटते सपने- बिखरता ख्वाब, नवोदित पत्रकार क्यों हो रहे बर्बाद

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प्रदेश में पत्रकारों की नई पौध तैयार है। दस, बीस, पचास नहीं, सैकड़ों-हजारों की तादाद में। ये वो युवा हैं जिन्होंने फौलादी इरादों के साथ पत्रकारिता की डिग्री ली है। नौकरी ढूंढने के लिए मारा-मारी है...होड़ है...छटपटाहट और उतावलापन भी है। असलियत से साबका पड़ा है। ढेरों ख्वाब और सारी रुमानियत भरभराकर गिरने लगी है...। इरादे टूटने लगे हैं...। यथार्थ की कठोरता हौसला डिगाने लगी है...। नौकरी क ौन कहे? अखबारों के मालिक युवा जर्नलिस्टों को इंटर्न तक कराने के लिए तैयार नहीं हैं।अभिव्यक्ति की आजादी और नैतिकता जैसी सीख लेकर युवा जब पत्रकारिता डिग्री लेने आते हैं तो मन में ढेरों सपने होते हैं। सुनहरे ख्वाह होते हैं। पढ़कर निकलते हैं तो सामने दिखती हैं खुरदुरी चट्टानें। ऐसी चट्टानें जिसे लांघ पाना हर किसी के बूते में नहीं होता। पत्रकारिता में दिखता और है, सच कुछ और होता है। अभिव्यक्ति की आजादी की बात करें तो वह अखबार मालिकों और चापलूस संपादकों की अलमारी में बंद होती है। उतनी ही खुलती है जितना वे खोलना चाहते हैं। नवोदित पत्रकारों को शायद यह पता नहीं होता कि अखबारों में लिखने से अब दुनिया नहीं बदलती।...

फीफा जैसे मंच पर आकर क्यों फ्लॉप हो जाता है मेस्सी मैजिक...?

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मौजूदा समय में फुटबॉल जगत में सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल यह है कि आखिर क्यों लियोनल मेस्सी बार्सीलोना के लिए खेलते हुए गोल्स की झड़ी लगा देता है, लेकिन जब यह दिग्गज अपनी राष्ट्रिय टीम के लिए खेलता है तो बेरंग नज़र आने लगता है. इसकी एक वजह यह भी है कि शायद यह मैजिसियन अपेक्षाओं के बोझ तले कहीं दब जाता है. लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या अर्जेंटीना के लिए खेलते हुए मेस्सी अपना शत प्रतिशत देने की कोशिश करते हैं? मेस्सी जिसे अर्जेंटीना में माराडोना का उत्तराधिकारी माना जाता है. वह उस जज्बात के साथ नहीं खेलते जैसा माराडोना खेला करते थे. उनकी शालीनता उनकी नेतृत्व क्षमता को ढक लेती है. दबाव में बिखरने की हजार वजहें हैं और मेसी के पास उससे निपटने का सिर्फ एक तरीका है अपनी प्रतिभा. क्वालीफायर में उनकी प्रतिभा ही थी जो अर्जेंटीना को खींचकर विश्व कप तक लाई. लेकिन क्रोएशिया के खिलाफ उन पर दबाव भारी पड़ा. और इसकी शुरुआत शायद आइसलैंड के खिलाफ पेनाल्टी मिस करने के दौरान ही हो गई थी. मेस्सी अर्जेंटीना के फुटबॉल के मसीहा हैं और मसीहा से चमत्कार की उम्मीद होती है, बचाव की नहीं. मेसी इस उम्मीद प...

फीफा विश्वकप 2018: नेमार की नुमाइश रही फीकी, 40 साल बाद ब्राजील ने बनाया ऐसा शर्मनाक रिकॉर्ड

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फीफा विश्वकप 2018 में अभी तक फेवरेट टीमों की स्थिति कुछ सुखद नहीं कही जा सकती. जिस मैच से पहले फुटबॉल प्रेमी उम्मीद लगा रहे हैं कि शायद यह मैच एकतरफा होगा वह बिल्कुल उसके विपरीत होता दिख रहा है. कल खेले गए दो मुकाबलों के नतीजें तो एक दम से हैरान करने वाले थे. पहले डिफेंडिंग चैंपियन जर्मनी को मैक्सिको के हाथों शिकस्त झेलनी पड़ी. फिर खिताब के प्रबल दावेदारों में शुमार पांच बार की चैंपियन ब्राजील ने को भी स्विट्जरलैंड के खिलाफ ड्रा से ही संतोष करना पड़ा. इससे पहले स्टार खिलाड़ियों से सजी अर्जेंटीना का अनुभवहीन आइसलैंड के सामने जो हाल हुआ वो किसी से छुपा नहीं है. बता दें, रविवार को ​वर्ल्ड कप 2018 के ग्रुप-ई के अपने पहले मुकाबले में स्विट्जरलैंड से 1-1 का ड्रॉ खेला. वर्ल्ड कप में 1978 के बाद यह पहली बार हुआ है जब ब्राजील की टीम अपना ओपनिंग मुकाबला जीतने में नाकाम रही. यही नहीं ऐसा पहली बार हुआ जब जर्मनी, ब्राजील और अर्जेंटीना विश्व कप में अपना शुरुआती मैच नहीं जीत पाईं. अर्जेंटीना ने अपना पहला मैच आइसलैंड के साथ 1-1 से ड्रॉ खेला. जर्मनी की टीम मैक्सिको से 0-1 से हार गई. पहला गोलः 20वें मिनट ...

प्रधानमंत्री जी ! बहुत उम्मीदें थी आपसे लेकिन अभी तक निराश हूँ

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"मैं यहां आया नहीं हूं मुझे बुलाया गया है, गंगा मैया ने बुलाया। देश की कमान 60 महीनों के लिए इस प्रधानसेवक को सौंप दीजिए। पाई पाई का हिसाब दूंगा। मुझे देश का चौकीदारी बना दीजिए। न खाउंगा न खाने दूंगा।" आपके ऐसे ना जाने कितने बयान थे, जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान छपे अखबारों में हेडलाइन बनकर सुर्खियां बटोरीं। चुनावी रैलियों के मंचों के साथ आपके भाषण बदलते रहे, बिहार गए तो बिहार की जनता का दर्द आपकी जुबान पर था और यूपी आए तो यूपी की जनता का दर्द। अपनी क्षमताओं की नुमा​इश से आपने एक ऐसा माहौल बना दिया मानो हर मर्ज की एक ही दवा है मोदी। सरकारी विभागों के भ्रष्टाचार से लेकर राजनीति में वंशवाद और परिवारवाद तक, किसानों की आत्महत्या से सीमा पर आतंकवादियों के खिलाफ लड़ाई में जान गंवाते सेना के जवानों तक, गरीबों को उनका हक दिलाने से लेकर विदेशों में छुपाए कालेधन को वापस लाने तक और शिक्षा के गिरते स्तर से लेकर रोजगारों के अवसरों को बढ़ाने तक हर परेशानी को दूर करने की जिम्मेदारी आपने ली थी। वो भी 60 महीनों में। आज आप प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल का तीन च...

बलिया बनाम लखनऊ, बागी बनाम तहजीब

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पड़ोसी (अंसारी जी) ने लिख मेरी बाइक पर चस्पा किया है। (मैंने उनके गेट के सामने अपनी बाइक लगा दी थी) हर शहर और इलाके की आब ओ हवा का अपना एक अलग रंग और मिजाज होता है जिसका असर वहां के लोगों पर देखा जा सकता है। इस बात को आज मैने बड़े करीब से महसूस किया। ' वीरों की धरती जवानों का देश बागी बलिया उत्तर प्रदेश' इस कहावत को सुनकर जवान होते-होते कब मैं अपने भीतर एक बागी को देखने लगा यह बात मुझे भी नहीं मालूम, जिन्दगी आगे बढ़ी और मैं भी आगे बढ़ने और कुछ बड़ा करने के इरादे के साथ बलिया से निकल लिया। साथ में मां बाप के अशीर्वाद और जरूरत के सामान के साथ जो चीज सबसे भारी समझ पड़ रही थी वो अपना बागी एटीट्यूट था।  अपना नया ठिकाना लखनऊ में जमा था, जो चार साल बाद आज भी कायम है। वही चार दोस्त और एक दो कमरों का किराए का मकान जिसे हम जैसे बागी फ्लैट का नाम दे चुके हैं। पढ़ाई, नौकरी और बागी की प्राइवेट लाइफ इन तीन बातों के बीच मजे की बीत रही है। लखनऊ आकर बहुत कुछ बदला है, बहुत कुछ सीखा है तो बहुत कुछ पीछे छूट गया।  बहुत दिन बाद आज फिर कुछ नया सीखने को मिला, जो लखनऊ के सिवा कोई और शहर नहीं...

एक काल्पनिक जिसे पढ़ शायद हर कोई भावुक हो जाये

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          डियर मम्मी पापा,  आज 9 साल के बाद मेरे बारे में एक बार फिर अदालत का फैसला आया है. मैं कहीं दूर आसमान से इसे देख पा रही हूँ और अब जब आप दोनों आज डसना जेल से निकालेंगे तो यकीन मानिये मैं बहुत खुश हो रही होंगी आखिर किस बच्चे को अपने मम्मी पापा को जेल में देख कर अच्छा लगता है . पापा, आपकी लाडली अगर आज आपके पास होती तो आप उसका 22 वाँ जन्मदिन मनाने की तैय्यारियों में जुटे होते. और मैं शायद अपने मम्मी पापा की तरह ही एक डाक्टर बन चुकी होती या शायद कुछ और मगर जो भी होती आपको गर्व होता. लेकिन मेरी किस्मत में शायद ये लिखा ही नहीं था. मैं आप दोनों के साथ एक खुशहाल जिंदगी बिताना चाहती थी हर दूसरे बच्चे की तरह, लेकिन 16 मई 2008 की रात हम सब पर भारी रही. मम्मी तुम तो जानती हो मेरे बारे में. हर माँ अपने बच्चे के बारे में सब कुछ जानती है. मेरे सपने को मेरे दोस्तों को और मेरा सब कुछ. मगर यहाँ से मैं ये भी देख रही हूँ कि देश भर में लोग उस 16 मई की रात क्या कुछ हुआ उसे जानना चाहते हैं. आखिर क्यूँ आप दोनों को इतने लम्बे समय तक जेल में रहना पड़ा , ये भी ...

चंद रवीश और कुछ अंजना को छोड़ दें तो मीडियाकर्मियों के खून से सनी है 'पत्रकारिता'

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आज एक दोस्त से मुलाकात हुई। मीडिया को लेकर वो मुझसे मेरा अनुभव जानना चाहते थे। मैंने कहा यह अनुभव दुखी नहीं करता वरन इसके बारे में सोच कर घिन आने लगती है। वे ये सुन ऐसे देखने लगे, जैसे वो कोई और ही जवाब तलाश रहे थे। कुछ स्टार वाला, फेम वाला, नेम वाला। उन्हें भी उसी आंख से दिमाग में उतरने वाली चकाचौंध सा जवाब चाहिए था। मेरा जवाब सुन वो बोल पड़े, कैसे? मुझे बस इस एक शब्द का इंतजार था, कैसे। और मैंने कहा कि एक मीडिया का बंदा अपनी पूरी जिंदगी इस फील्ड को देता है, लेकिन बदले में उसे क्या मिलता है। कुछ टूटे सपने, शोषण, निराशा, अवसाद और चिल्लर वाली सैलरी, जिससे ढंग से उसका खर्च तक न चल सके। एक गाय की मौत पर घंटों चीखने वाले टीवी चैनल और पेपर घिसने वाले अखबार के मालिकान और संपादक को यह परवाह नहीं कि उसका कर्मचारी तिल-तिल मर रहा है। उसके सपने एक-एक कर टूट रहे हैं, बिखर रहे हैं। जिन्हें सहेजने का कोई उपाय नहीं। चेन की छिनौती करने पर डेढ़ कॉलम न्यूज छापने वाले अखबार की ये औकात नहीं कि अपने कर्मचारी की मां के लिए तीन लाइन की शोक संवेदना छाप सके। चंद रवीश और कुछ अंजना को छोड़ दें तो बाकी मीडिया ...

नमक तो स्वादानुसार ठीक था, अब मुद्दे भी...

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अखबार की बेस्वाद कवर स्टोरी, समाचार चैनलों पर हर शाम होने वाली बेमतलब की बहस और सोशल मीडिया पर बुद्धिजीवी वर्ग की पोस्ट का स्वाद कब बदल जाए ये किसी को नहीं पता। इन सब को बदलने के लिए तड़का चाहिए होता है, ठीक वैसा जो घर की दाल में अनिवार्य रूप से लगाया तो जाता है, लेकिन ज्यादा मजा होटल की दाल वाला देता है। यहां हम घर की दाल त्रिपुरा के शांतनु भौमिक हत्याकांड और पंजाब में केजे सिंह हत्याकांड को मान सकते हैं और होटल की दाल के तौर पर बेंग्लुरू के गौरी लंकेश हत्याकांड को ले सकते हैं। इन तीनों हत्याकांड की तुलना आपस में किया जाना बेहद गलत है, लेकिन इसके बावजूद करना पड़ता है क्योंकि बहुत बड़ा और अक्सर चुनिन्दा मुद्दों पर मुखर होने वाला वर्ग इन घटनाओं को चुपचाप तौलने में जुटा है। तो चलिए अब तुलना शुरू करते हैं। पहला मामला गौरी लंकेश की हत्या का था। दो तीन अपराधी आते हैं और गोली मारकर उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। यह एक दर्दनाक लेकिन एक सामान्य सी नजर आने वाली आपराधिक घटना थी। इसके बाद दूसरा मामला है शांतनु भौमिक के अपहरण और हत्या का है। शांतनु का अपहरण उस समय हुआ जब वह रिर्पोटिंग ...

काश! किसी ने पहल की होती।, आज बीएचयू का तमाशा नहीं बनता

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देखते ही देखते एक अच्छा-खासा और जरूरी सा आंदोलन कब हिंसाई और बौद्धिक तमाशा में बदल जाता है समझ में नहीं आता. लड़कियों की मांग कहाँ गलत थी. ? क्या अपनी सुरक्षा की मांग करना नाजायज है ? या उपर से ये कहना कि दो मिनट वीसी साहेब आकर मिल लेंगे तो हम लोग अपना प्रदर्शन बन्द कर देंगे। कितना अच्छा होता कि पहले ही दिन वीसी साहेब आते और लड़कियों के सर पर हाथ रखकर कह देते की "बेटी आप लोग निर्भीक रहें बीएचयू प्रशासन सदैव आपके साथ है" इतनी जिम्मेदारी तो बनती है न ? वाइस चांसलर एक यूनिवर्सिटी का गार्जियन ही तो है और बीएचयू प्रशासन संरक्षक। अब लड़कियां और लड़के अपनी बात इनसे नहीं कहेंगे तो किससे कहेंगे ? क्या इनको इतना पता नहीं था कि लड़कियों को सुरक्षा के प्रति आश्वस्त नहीं किया गया,तो कुछ लोग इस जरूरी आंदोलन के बहाने माहौल बिगाड़ने की भयंकर साजिश रच सकतें हैं..कुछ कलम लेकर बैठ सकते हैं और कुछ बम लेकर. और दुर्योग से वही हुआ भी..रात दस बमों की आवाज से समूचा परिसर ही नहीं दो किलोमीटर तक का इलाका गूंज उठा,अब बताइये ये बम बनाने वाले कौन लोग होंगे ? और उनकी मंशा क्या रही होगी.?। ये भी बताना...

सत्य की खोज में... मैं कौन हूं...

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पहले वह ठीक था। अपर डिविजनल क्लर्क है। बीवी है, दो बच्चे हैं। कविता वगैरह का शौक है। वह मेरे पास कभी-कभी आता। कोई पुस्तक पढ़ने को ले जाता, जिसे नहीं लौटाता। दो-तीन महीने वह लगातार नहीं आया। फिर एक दिन टपक पड़ा। पहले जिज्ञासु की तरह आता था। अब कुछ इस ठाठ से आया जैसे जिज्ञासा शांत करने आया हो। उसका कुर्सी पर बैठना, देखना, बोलना सब बदल गया था। उसने कविता की बात नहीं की। बड़ी देर तो चुप ही बैठा रहा। फिर गंभीर स्वर में बोना, 'मैं जीवन के सत्य की खोज कर रहा हूं।' मैं चौंका। सत्य की खोज करने वालों से मैं छटकता हूं। वे अक्सर सत्य की ही तरफ पीठ करके उसे खोजते रहते हैं। मुझे उस पर सचमुच दया आई। इन गरीब क्लर्कों को सत्य की खोज करने के लिए कौन बहकाता है? सत्य की खोज कई लोगों के लिए अय्याशी है। यह गरीब आदमी की हैसियत के बाहर है। मैं, कुछ नहीं बोला। वही बोला, 'जीवन-भर मैं जीवन के सत्य की खोज करूंगा। यही मेरा व्रत है।' मैंने कहा, 'रात-भर खटमल मारते रहोगे, तो सोओगे कब।' वह समझा नहीं। पूछा, 'क्या-मतलब। मैं आपके पास आता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि आप भी सत्य की खोज ...

गौरी पर 'गौर' किया, अब शांतनु पर इतनी 'शांति' क्यों...

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करीब एक पखवाड़े पहले कन्नड़ मूल की लेखिका व पत्रकार गौरी लंकेश की उनके घर पर ही दर्दनाक ढंग से हत्या कर दी गयी, जिस पर पूरे देश ने गुस्सा व दुःख जाहिर किया। हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग की गयी, मुठ्ठा भर कैंडल लेकर लोगों ने मार्च  किया, विशेष विचारधारा के लोगों पर आरोप-प्रत्यारोप लगाये गए, देश के कई शहरों में जनसैलाब एकत्रित हुआ, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया पर सभाएं आयोजित हुई, मीडिया ने भी अपने प्राइम टाइम में इसके खिलाफ आवाज़ उठाई, सोशल मीडिया लगभग गौरी को श्रधांजलि देने वालों से भर गया था।  इन सभी चीजों को देख मुझे बड़ा ही गर्व हुआ, मुझे लगा कि शायद आगे यह नौबत न आये, अब किसी कलमकार पर हमला  को दस बार सोचना पड़ेगा, इस भीड़ की आवाज़ को सुन, इस गुस्से को देख, वह जरुर थर्रा गया होगा। ऐसे लोग जो प्रेस की आजादी पर चोट करने की फिराक में रहते है, ऐसे लोग जो कलम की नोंक तोड़ने की चाहत रहते हैं आज उन्हें अंदाज़ा हो गया कि देश भर के कलमकार जब एकजुट हो जाये तो हवा का रुख मोड़ सकते हैं, सरकार को कटघरे में ला सकते हैं, जनता की आवाज़ को नया सुर दे सकते हैं। भले ही आज भी गौरी के हत्यारे पुलिस की ...

पत्रकारों की भी दुसवारियाँ हैं साहब

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गांव में मेरे कुल-पुरोहित के बेटे जगदीश बाबा लंबी बेरोजगारी झेलकर बनारस के किसी अखबार का स्ट्रिंगर बनने में सफल रहे। जल्द ही लोग उनकी साइकल पहचानने लगे, जिसकी डोलची पर उनका और उनके अखबार का नाम लिखा था। स्ट्रिंगर जमीनी स्तर पर अखबारों के हाथ-पांव होते हैं लेकिन उन्हें नियमित वेतन नहीं, छपी खबर की लंबाई के हिसाब से मेहनताना मिलता है। चार-छह मील के दायरे में जगदीश बाबा अपने अखबार के प्रतिनिधि थे। थानों और कोटा-परमिट की दुकानों में उन्हें बैठने के लिए कुर्सी मिलती थी। जब-तब छोटे-मोटे फायदे भी। लेकिन इलाके में उनकी छवि एक महापंडित के नालायक बेरोजगार बेटे की ही बनी रही। एक बार जगदीश बाबा ने किसी चौकी इंचार्ज के बारे में कोई तीखी खबर लिख दी तो उसने उन्हें चोरी के मामले में फंसा दिया और हवालात में बंद करके उनकी खूब पिटाई की। जगदीश बाबा के बारे में मेरे पास ठोस सूचनाएं इतनी ही हैं, सो उनको हीरो या विलेन की श्रेणी में रखना मेरे लिए संभव नहीं। हां, इतना पता है कि उनकी मृत्यु जहर से हुई और मेरे विद्वान कुल-पुरोहित के लिए अपने इकलौते बेटे का जीना और मरना, दोनों सतत पीड़ा के कारण बने रहे। ...

ऐसा मत कर तू लड़की है!

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‘ऐसा मत कर तू लड़की है’, ‘ज़ोर से मत बोल, ज़ोर से मत हंस तू लड़की है’, सिर झुका के चल,’लड़की होके बड़ों से ज़ुबान लड़ाती हो? ये सब बातें तब से ही सुनने को मिली हैं जब से कुछ जानने समझने लायक हुई। थोड़े और बड़े हो गएं तो घर से बाहर निकलना बंद, बस काम के लिए निकलो, अपने भाइयों के साथ भी नहीं खेलना बंद। बड़े भाई या पिता जी के साथ चारपाई पर नहीं बैठ सकती क्योंकि तुम एक लड़की हो। घर का सारा काम सीख लो, क्योंकि तुम एक लड़की हो। पैदा होते ही अमूमन हर लड़की को उसके हंसने -रोने, खाने -पीने, बोलने सब के मानक तय कर दिए जाते हैं। इस तरह जब एक लड़की बड़ी होती है उसको पितृसत्ता का वह रूप स्वाभाविक लगने लगता है जो धीरे-धीरे उसके भविष्य को दीमक की तरह चाट रहा होता है। लड़कियों को उनके और उनके भाई के साथ किया जाने वाला विभेद भी स्वाभाविक लगने लगता है। वह रात को चाहे जितनी देर से घर आए, कोई दिक्कत नही क्योंकि वह लड़का है। पिताजी घर में चाहे जितनी तेज़ आवाज़ में बात करें, गलत होने पर भी माँ के ही ऊपर ही चिल्लाएं पर माँ चुपचाप सुनती जाती है क्योंकि पिता जी एक पुरुष हैं। यहीं से उसमें पुरुष की श्रेष्ठता का स्वाभाविक ...